अंगडा़ई पे अंगडा़ई

 

अंगडा़ई पे अंगडा़ई लेती अरमाँ तनहाई में

जीवन के सुर ढूँढे दीवानी आज किसी शहनाई में

 

दूर पपीहा टेर लगाए सारी दुनिया सुनती है

सपने सँजोए डूब चुकी वो यादों की गहराई में

 

कितनी घड़ियाँ बाकी है अब रात मिलन की आने में खामोशी की चादर ओढ़े वादों की भरपाई में

 

वक्त का पहिया घूम रहा है वक्त का कोई ठौर नहीं

बीते दिन लौटेंगे क्या फिर जो बीते अमराई में

 

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