उत्तर भारतीय संगीत / INDIAN MUSIC

भारत में संगीत की दो पद्दतियां हैं | पहला उत्तर भारतीय संगीत या हिन्दुस्तानी संगीत | दूसरा है दक्षिण भारतीय संगीत या कर्नाटक संगीत | यहाँ हम मुख्य रूप से उत्तर भारतीय संगीत की चर्चा करेंगे |

सबसे पहले संगीत का अर्थ जानें | शारंगदेव रचित संगीत के प्राचीन ग्रन्थ ‘ संगीत रत्नाकर ’ में लिखा हुआ है “ गीतं , वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते ” अर्थात गायन , वादन और नृत्य इन तीनों का सम्मलित रूप संगीत कहलाता है |

संगीत के शास्त्रकारों ने ललितकला के पाँच श्रेणियों की बात कही है – 1 . संगीत 2 . कविता 3 . चित्रकला 4 . मूर्तिकला और  5 . वास्तुकला | इन ललितकलाओं में संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है | इस प्रकार संगीत समस्त कलाओं में सर्वश्रेष्ठ हुआ | यहाँ हम संगीत के शास्त्र पक्ष और क्रियात्मक पक्ष दोनों की चर्चा करेंगे |

संगीत में कुछ शब्दों की परिभाषा जाने बिना कुछ भी समझना आसन नहीं होगा | इसलिए इन शब्दों के अर्थ जानिये |

गायन और वादन में ध्वनि ही निकलती है | तो क्या कोई भी ध्वनि संगीत होती है ? जी नहीं , जो ध्वनि कर्णप्रिय हो मतलब सुनने में मधुर हो उसे ही संगीत कहेंगे |

नाद – नाद उस मधुर ध्वनि को कहते हैं जिसे संगीत में व्यवहार में लाते हैं | नाद दो प्रकार के होते हैं | पहला आहत नाद और दूसरा अनाहत नाद | आहत नाद बाहर होता है , जिसे सभी सुन सकते हैं | अनाहत नाद मन में होता है , जिसे दूसरे लोग नहीं सुन सकते हैं |

1 . नाद का छोटा बड़ा होना – संगीतोपयोगी ध्वनि जब अधिक दूर तक सुनाई दे तो उसे बड़ा नाद कहते हैं | वही आवाज जब धीरे हो याने सिर्फ नजदीक में ही सुनाई दे तो वह छोटा नाद होता है | जैसे आप रेडियो या टी.वी .( TV ) का वॉल्यूम कम या अधिक करते हैं | आप धीरे धीरे तबला बजाएं तो छोटा नाद , जोर से बजाएं तो बड़ा नाद |

2 . नाद की ऊंचाई –निचाई – नीचे नाद की ध्वनि की आवृति ( frequency ) कम होती है और ऊंचे नाद के ध्वनि की आवृति अधिक होती है | पुरुष की आवाज नीचा नाद है और स्त्री की आवाज ऊंचा नाद है | आवाज का मोटा पतला होना ही नाद का नीचा ऊंचा होना है |

3 . नाद की जाति और गुण – जिस प्रकार आप अपनी आँखें बंद कर अपने परिवार के सदस्यों की आवाजें  अलग-अलग पहचानते हैं क्योंकि उसमें कुछ भिन्नता होती है | आपने कई वाद्ययंत्रों की आवाजें सुनी होगी | जैसे गिटार , वायलिन , बांसुरी , हारमोनियम , तबला , ड्रम इत्यादि की आवाजें एक दूसरे से अलग हैं | गिटार , सितार , वायलिन , सरोद , इसराज , मेंडोलिन , तानपूरा इत्यादि तार वाद्य हैं | तारों के कम्पन से ध्वनि उत्पन्न होती हैं | बांसुरी , हारमोनियम , मानव कंठ आदि की आवाजें हवा के कम्पन से ध्वनि पैदा होती हैं | तबला , पखावज , ढोलक , नगाड़ा , ड्रम इत्यादि की ध्वनियाँ तने  हुए चमड़े पर आघात करने पर चमड़े के कम्पन से उत्पन्न होती हैं |

श्रुति – आपने गाने वालों को सुना होगा वे गाते हैं – सा , रे , ग , म ,प , ध , नि , सां | सा से सां तक असंख्य नाद हैं लेकिन संगीत के विद्वानों ने अनुभव किया कि 22 ( बाईस ) नादों को अलग अलग पहचाना जा सकता है | अब असंख्य नादों की बात नहीं होगी | बाईस श्रुतियों का व्यवहार संगीत में होता है |

स्वर – अब बाईस ( 22 ) श्रुतियों से मात्र बारह श्रुतियों को स्वर की संज्ञा दी गई है | अब सिर्फ बारह स्वरों के बारे में जानिये | इसी बारह ( 12 ) स्वरों पर संगीत का महल खड़ा है | इस बारह स्वरों में सात ( 7 ) स्वर शुद्ध स्वर कहलाते हैं | बाकी पाँच स्वर विकृत स्वर कहलाते हैं | इनमें चार कोमल विकृत और एक तीव्र विकृत है | थोड़ा आगे पढ़िए समझना आसन हो जाएगा |

स्वरों के नाम – षड़ज , ऋषभ , गांधार , मध्यम , पंचम , धैवत और निषाद | आसानी के लिए इनके संक्षिप्त नामों का व्यवहार होता है | नाम क्रमशः सा , रे , ग , म , प , ध और नि हैं | यही छोटे नामों का व्यवहार स्वरलिपि लिखने में होता है | अब इन सात शुद्ध के अतिरिक्त पाँच विकृत स्वरों के बारे में जानें | रे , ग , ध और नि के कोमल विकृत स्वर बनते हैं और म का तीव्र विकृत | शुद्ध स्वर से नीचे उतर कर कोमल स्वर बनते हैं | म से ऊपर का विकृत स्वर तीव्र म होता है |

स्वरों को दो वर्गों में बांटा गया है , चल और अचल | जिन स्वरों के विकृत स्वर होते हैं उन्हें चल स्वर कहते हैं | ये हैं रे , ग , म ,ध और नि | सा और प अचल स्वर हैं |

सप्तक – सात स्वरों के क्रमानुसार समूह को सप्तक कहते हैं | इनका क्रम है – सा , रे , ग , म , प , ध और नि | अगला स्वर तार सप्तक का सां आ जाता है | गायन –वादन में सामान्यतः तीन सप्तकों में होता है | आप जब कोई गाना गायेंगे तो मुख्य रूप से जिस सप्तक में आपका गाना होगा वह मध्य सप्तक कहलाता है | इससे ऊपर वाला सप्तक तार सप्तक कहलाता है | मध्य सप्तक के नीचे वाले सप्तक को मन्द्र सप्तक कहते हैं | आपने ‘ की बोर्ड ’( इलेक्ट्रॉनिक आर्गन ) में अधिक सप्तक देखे होंगे | तार सप्तक से ऊंचे सप्तक को अनु तार सप्तक और मन्द्र सप्तक से नीचे वाले सप्तक को अनुमन्द्र सप्तक कहते हैं |

आन्दोलन / कम्पन / बारंबारता / vibration / frequency  ध्वनि की उत्पत्ति हवा के कम्पन के कारण होती है | भारतीय संगीत में स्वरों के कम्पन निम्नलिखित हैं |

सा ————–   240

रे ( कोमल रे )— 256

रे —————— 270

( कोमल ग ) – 288

ग —————— 300

म —————–  320

म’ ( म तीव्र ) — 337.5

प —————–  360

( कोमल ध ) – 384

ध  ————-   405

नि ( कोमल नि ) – 432

नि —————-   450

सां ( तार सप्तक का सा ) – 480

तार सप्तक के सारे स्वरों के ऊपर एक बिंदु दी जाती है , जैसे :– सां , रें , गं , मं इत्यादि | मन्द्र सप्तक के स्वरों के नीचे एक बिंदु दी जाती है , जैसे :– सा़ | अनुतार सप्तक के स्वरों के ऊपर दो बिंदियाँ दी जाती हैं और अनुमन्द्र सप्तक के स्वरों के नीचे दो बिन्दुएँ दी जाती हैं |

संगीत के प्रकार – भारतीय संगीत के मुख्य दो प्रकार हैं – शास्त्रीय संगीत और भाव संगीत |

1 . शास्त्रीय संगीत में राग रागनियों के स्वरुप को शुद्ध रूप में गाना या बजाना पड़ता है | हर राग की अलग विशेषता होती है | आरोह में कौन कौन स्वर लगेंगे और कौन से स्वर नहीं लगेंगे | इसी तरह अवरोह में भी वर्जित स्वर होते हैं | इसके अतिरिक्त हर राग की पकड़ भी होती है | यह ख़ास स्वरों का व्यवहार होता है जो गायन में बार बार आता है |

शास्त्रीय संगीत की गायन शैलियाँ  :–

ध्रुपद – ध्रुपद गायन की एक पुरानी शैली है | पहले राजा महाराजाओं के दरबार में दरबारी गायक होते थे | पहले लाऊड स्पीकर्स , माइक की तरह के ध्वनि विस्तारक यन्त्र नहीं होते थे | शायद इसी कारण ऐसी रचनाएँ बनी थीं जो जोर से गाया जा सके | गायन में बारीकियां नहीं होती थीं | लयकारी ही ध्रुपद की विशेषता है | बंदिश को पहले सामान्य लय में गाते हैं , उसके बाद दुगुन ,चौगुन और अंत में अठगुन लय में गाते हैं | गाने के चार भाग होते हैं – स्थाई , अन्तर ,संचारी और आभोग | ध्रुपद बारह मात्राओं के चारताल , दस मात्राओं के सूलताल और सात मात्राओं के तीब्रा ताल मे गाये जाते हैं |

ठेका – चारताल

मात्रा – 12 , विभाग 6 , ताली 1, 5, 9 और 11 पर | खाली 3 और 7 पर |

धा धा | दिं  ता | किट धा |

X     0        2

दिं ता | तेटे कता | गदि गन |

0      3         4

ठेका – सूलताल

मात्रा -10 , विभाग 5 , ताली 1 , 5 और 7 पर | खाली 3 और 9 पर |

धा धा | दिं ता | किट धा | तेटे कता | गदि गन |

X      0      2        3         0

ताल – तीब्रा

मात्रा 7 , विभाग 3 , ताली 1 , 4 , और 6 पर |

ठेका

धा दिं ता | तेटे कता | गदि गन |

X         2        3

आजकल इसका गायन नहीं होता है | संगीत शिक्षण में इसे सीखते जरूर हैं |

धमार – यह गाने का एक पुराना प्रकार है | धमार को होरी भी कहते हैं | इसके गानों में राधा कृष्ण और गोपियों के होली का वर्णन होता है | इसके गाने धमार ताल में ही निबद्ध होते हैं | धमार ताल का ठेका निम्नलिखित है –

ताल – धमार

मात्रा – 14 , विभाग – 4 , ताली 1 , 6 , 11 पर और 8 पर खाली |

ठेका पखावज

क धे टे धे टे | धा S | ग ते टे | ते टे ता S |

X            2     0       3

ठेका तबला

क धि ट धि ट | धा S | ग ति ट | ति ट ता S |

X             2      0        3

ख्याल – ख्याल गाने का एक प्रकार है | ख़याल में गायक की कल्पना का भी समावेश होता है | यह कलात्मक गायन का तरीका है | ख्याल दो प्रकार के होते हैं | पहला प्रकार है बड़ा ख़याल जिसे विलम्बित ख़याल भी कहते हैं | इसे विलम्बित लय में गाया जाता है | मतलब सामान्य लय से चार गुणा धीमा | विलम्बित एकताल की बंदिश  में सामान्य एक मात्रे को चार मात्रों में गाया जाता है | इसका अर्थ हुआ बारह मात्रे की एकताल अड़तालीस मात्रे की हो जाती है | एकताल के अलावे इसे तिलवाड़ा , झूमरा , झपताल , आड़ा चारताल इत्यादि में विलम्बित लय में गाया जाता है | इसे तबले के साथ गाया जाता है | गाने की अवधि अधिक होती है | एक डेढ़ घंटे तक एक बड़ा ख़याल गाते हैं | पहले लोगों के पास काफी समय रहता था ,तो सुनते थे | आजकल गाने वाले और सुनने वाले बहुत कम हो गए हैं | संगीत सीखने वाले इसे सीखते ही हैं |

छोटा ख़याल – इसे बीस तीस मिनट तक गाते हैं | आजकल दस पन्द्रह मिनटों में ही किसी विशेष राग की सारी खूबियों को दिखलाते हैं | गाने की सारी बारीकियों को अच्छी तरह प्रदर्शित करते हैं | मतलब मींड़ , खटका , मुर्की , कण आदि का प्रयोग कर एक समां बाँध देते हैं | हर राग की अलग अलग विशेषताओं को आप सुने बिना नहीं जान पायेंगे | गरिमामयी उत्तर भारतीय संगीत क्या है , यह किस तरह भावनाओं को सहलाती और आंदोलित करती है अब यह जान कर पाश्चात्य देशों में लोग दीवाने हुए जा रहे हैं |

ख़याल गायन के कुछ हिस्से हैं | जानकारी लीजिये –आलाप – आलाप में राग के स्वरुप को धीमी गति से गाते हैं |

बंदिश – गाये जाने वाले बोल और संगीत रचना ( composition ) को बंदिश कहते हैं | इसके दो हिस्से होते हैं , स्थाई और अंतरा |

स्थाई – स्थाई गाने का शुरू वाला हिस्सा होता है | यह आम तौर पर मध्य सप्तक में गाया जाता है |

अंतरा – स्थाई गाने के बाद अन्तरा गाया जाता है | इसका विस्तार तार राप्तक तक होता है |

तान – स्वरों को जब द्रुत गति से गाया जाता है तो उसे तान कहते हैं | स्थाई के बाद जो तान गाते हैं उसे स्थाई की तान कहते हैं और अंतरे के बाद गई जाने वाली तान को अंतरे की तान कहते हैं |

ठुमरी – इसे लोग सुगम शास्त्रीय संगीत ( light classical music ) भी कहते हैं | लेकिन यह इतना भी आसान नहीं है कि हर कोई गा सके | यह गायन चंचल प्रकृति का है | इसे राग खमाज , देश , तिलक कामोद , तिलंग , पीलू , काफी , भैरवी ,झिंझोटी , जोगिया आदि में गाया जाता है | ठुमरी दीपचंदी ताल में गाई जाती है | दो चार लाइनों में ही पाँच दस मिनट गाते हैं | एक ही लाईन को पन्द्रह बीस प्रकार से गाते हैं | इत्मीनान से ठुमरी सुनिए किसी दूसरी दुनिया में आप खो जायेंगे |

टप्पा – टप्पा पंजाब का एक लोक गीत है | यह बहुत ही सुरीला होता है | टप्पे के दो हिस्से स्थाई और अन्तरा  के रूप होते हैं | गाने के एक हिस्से में सवाल रहता है और दूसरे हिस्से में उसका जवाब होता है | जिस गायक के गले में बहुत बारीकी होती है वही इसे गाते हैं | खटका , मुर्की , कण आदि का प्रयोग काफी होता है |

भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनने पर मन शांत होता है , तनाव से मुक्ति मिलती है | आदमी का उग्र स्वाभाव सामान्य हो जाता है | यह संगीत सुनने पर मन की एकाग्रता बढ़ती है |

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