दुविधा में आज हम

 

दुविधा में आज हम ऐसे खड़े हैं

सामने विकल्प जहाँ बहुत से पड़े हैं

 

कहीं छप्पर से तारे नजर आते हैं

और कहीं छत में सितारे जड़े हैं

 

नौकरी मिलती नहीं ज़िन्दगी भर में

मिली जिनको हैं वे नशे में पड़े हैं

 

खाद के लिए बैल पाले गये हैं

खेत भेड़ -बकरे जोतने खड़े हैं

 

नदियाँ शराब की बहाई गयी हैं

बिना पानी के घड़े सूखे पड़े हैं

 

उसी की होगी भैंस, जिसकी लाठी

इसी बात पर लोग कब से अड़े हैं

 

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