प्राकृतिक चिकित्सा || Naturopathy

 

प्राकृतिक चिकित्सा Naturopathy बहुत प्राचीन इलाज का तरीका है | इसकी शुरुआत ईसा पूर्व 460 से 377 के बीच हुई थी | हिपोक्रेटीज ने इसी पद्दति का प्रचार जीवन भर किया था | उनके मृत्यु के बाद लोगों में इस पर रूचि घट गई थी  | फिर 1829 ईस्वी में विन्सेज प्रिस्निज़ ( Vincenz Priesnitz ) ने ग्रेफेनबर्ग में एक चिकित्सा गृह की स्थापना की | इसके सम्बन्ध में जानकर आपको आश्चर्य होगा कि प्रिस्निज़ एक अशिक्षित किसान था | वह किसी भी बात को बहुत बारीकी से सोचता समझता था | पहले वह स्वयं बीमार रहता था | स्वयं अपना इलाज करने के क्रम में उन्हें ठन्डे पानी की अद्भुत शक्ति का पता चला | जिससे विभिन्न रोगों का  उपचार करने में सफलता पाई | एक समय ऐसा आया कि उनका स्वास्थ्यगृह रोगियों के लिए तीर्थस्थान बन गया | दुनिया भर से लोग इलाज कराने  झुण्ड के झुण्ड पहुँचने लगे और स्वस्थ हो कर लौटेने लगे | इनकी सफलता देख कर उस समय के पुरानी सोच वाले चिकित्सकों को बहुत ईर्ष्या हुई | सभी चिकित्सक इनके विरोधी बन गए और प्रिस्निज़ को बदनाम किया , हंसी उड़ाई , गालियाँ दीं | इससे भी मन नहीं भरा तो अदालत में कानूनी कार्रवाई भी की | प्रिस्निज़ ने हार नहीं मानी , बारी बारी से सबका सामना किया और अंत में अपने विरोधियों पर विजय पाई | उत्पीड़न से मुक्ति पाने के बाद उनकी कीर्ति और प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई की लोग उन्हें महान प्राकृतिक चिकित्सक मानने लगे | इनके विरुद्ध का दुष्प्रचार ही इनका विज्ञापन बन गया था |

उन्होंने अपनी चिकित्सागृह के पास एक पत्थर के स्तम्भ पर लिखवाया – “ तुम्हे धीरज रखना होगा !” असल में प्राकृतिक चिकित्सा में धैर्य रख कर ही शरीर को रोगमुक्त करना पड़ता है |

एक अंग्रेजी कहावत है, “ prevention is better than cure .” हिंदी का नीतिवचन है , “ रोकथाम इलाज से बेहतर है ! ” इसी आशय का बेंजामिन फ्रैंकलिन का कथन है , “ रोकथाम का औंस इलाज के पौंड के बराबर है ! ” | ( 16 औंस = 1 पौंड ) मतलब रोकथाम के खर्च से सोलह गुणा खर्च अधिक होता है इलाज का |

अब बात है कि रोकथाम कैसे करें जिससे हम निरोग रहें | प्राकृतिक चिकित्सा में एक शब्द का प्रयोग बहुत अधिक होता है , वह है  “ जीवन – शक्ति ” | यह जीवन शक्ति हर आदमी के अन्दर होता है | जिस मनुष्य में जीवन शक्ति कम होती है वह बार – बार बीमार पड़ता है और जिसकी जीवन शक्ति अधिक होती है वह कम बीमार पड़ता है | कोई आदमी हमेशा सुस्त रहता है , चेहरा मुरझाया हुआ रहता है , बार बार बीमार पड़ता है तो जान लीजिये कि उसकी जीवन शक्ति कम है | ऐसे लोगों को भी आपने देखा होगा जो हमेशा ऊर्जावान बने रहते हैं | कोई भी काम करने को हमेशा तत्पर रहते हैं और मामूली सर्दी –खांसी भी नहीं होती | ऐसे लोगों के चेहरे दमकते रहते हैं | यह मजबूत जीवन शक्ति वालों की पहचान है |

अपना स्वास्थ्य अच्छा बनाना है तो जीवन शक्ति बढ़ानी होगी | तरीका एकदम सरल है जीवन शक्ति बढ़ाने का | कुछ अच्छा चाहिए तभी अच्छा होगा | मतलब सुबह की धूप , ताज़ी हवा ,शुद्ध पानी , संतुलित भोजन , पूरा आराम ( विश्राम ), गहरी नींद , सकारात्मक सोच और अच्छी आदतें  | अब इन्हें संक्षेप में जानें और उसके बाद प्राकृतिक चिकित्सा की प्रयोग विधि की जानकारी लेंगें |

 

सूर्य स्नान / धूप स्नान / SUN BATH

संसार के सभी प्राणियों को सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है | जीवनी शक्ति बढ़ाने के लिए अधिक – से – अधिक समय धूप और प्रकाश में बिताइए |

 

इसके प्रयोग विधि को ‘ सूर्य स्नान ’( SUN BATH ) कहते हैं | लोग इसे  ‘ धूप स्नान ’ भी कहते हैं , जो ज्यादा सटीक लगता है |  सुबह की धूप शरीर पर सीधी पड़ती है , तो सुबह ही सूर्य स्नान लें | सूर्य की गर्मी झेलनी है तो सबसे पहले एक –दो ग्लास पानी पी लीजिये | हल्का वस्त्र पहनना है तभी तो धूप शरीर की चमड़ी तक पहुंचेगी | एक गमछा पहन ( लपेट ) लीजिये और पानी से भीगा तौलिया सिर पर रखिये | धूप में निकल कर टहलिए | अगर सूर्य स्नान ( SUN BATH ) के साथ ‘ भाप स्नान ’( STEAM BATH )  का भी फायदा लेना हो तो अधिक समय धूप में बिताइए | काफी पसीना निकलेगा | थोड़ी – थोड़ी देर में पानी पीते रहिये | सिर का भीगा तौलिया भी सूखने लगे तो फिर से भिगाइए |  यह दस पन्द्रह मिनट भी कर सकते हैं | दो –तीन घंटे भी कर सकते हैं | यह धूप स्नान प्रतिदिन लीजिये | घबराइए मत , भवन निर्माण , सड़क निर्माण ,खेत खलियान  और धूप में खेलते लोगों को तो आपने देखा ही होगा | शुरू में कम समय के लिए  धूप में रहिये ,बाद में अपनी सुविधानुसार समय बढ़ाएं | सूर्य स्नान के बाद शरीर के पसीने को भीगे तौलिये से पोंछ कर शरीर को सामान्य तापक्रम में ले आयें | इसके बाद सामान्य पानी से नहा लीजिये |

इसके फायदे भी जान लीजिये | सूर्य स्नान से शरीर के रोम कूप खुल जाते हैं और शरीर के दूषित पदार्थ पसीने के साथ निकल जाते हैं | मेटाबालिज्म ( METABOLISM ) की दर बढ़ जाती है | शरीर विटामिन डी ( VITAMIN D ) सोखता है , जिसके कारण शरीर आसानी से कैल्शियम और फास्फोरस ग्रहण करता है | खून में  सफ़ेद और लाल रक्तकण बढ़ते हैं | शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता ( IMMUNITY ) बढ़ती है |

ताज़ी हवा ( FRESH AIR ) सभी प्राणियों को साँस लेने के लिए शुद्ध हवा की आवश्यकता होती है | मनुष्य बिना खाना – पानी के कुछ दिन जीवित रह सकते हैं , लेकिन हवा के बिना नहीं | आप को मालूम ही होगा कि हवा में जो आक्सीजन गैस मौजूद है वही हमारे काम की है | हम जब साँस लेते हैं तो हमारे फेफड़ों में हवा भरता है | हवा में मौजूद आक्सीजन खून की सफाई करता है , जिससे कार्बन डाई ऑक्साइड बनता है ; जो हमारे साँस छोड़ने पर बाहर निकल जाता है | बंद कमरे में ए.सी.चला कर आराम से बहुत सारे लोग काम करते या रहते हैं | तो उस कमरे के हवा में आक्सीजन का स्तर घटेगा और कार्बन डाई आक्साइड का स्तर बढेगा | ऐसी स्थिति से बचें | घर की खिड़कियाँ खुलीं रहे , बंद कमरे में हमेशा न रहें |

जब हम बैठे हुए स्थिति में होते हैं तो शरीर कुछ झुका हुआ होता है | ऐसी स्थिति में जब हम साँस लेते हैं तो पूरे फेफड़े में हवा नहीं भरता है | हवा फेफड़े के सिर्फ ऊपरी हिस्से में आता है | मतलब कम आक्सीजन का उपयोग हो रहा है | चाहे आप खड़े हों या बैठे हों कमर से ऊपर का हिस्सा सीधा रखें | लम्बी सांसें लें और लम्बी सांसें छोड़ें | शरीर में आक्सीजन का ज्यादा फायदा लेना है तो रोज प्राणायाम ( pranayam ) करें | अनुलोम – विलोम करें | अपने नाक के दाहिने नथने को अंगूठे से दबाएँ और बायें नथने से लम्बी साँस धीरे –धीरे खींचें और अपने फेफड़ों को हवा से पूरी तरह भर लीजिये | फिर दाहिने नथने से अंगूठे को हटा कर तर्जनी उंगली से नाक के बाएं नथने को दबाएँ और दाहिने नथने से धीरे –धीरे साँस छोडिये ताकि फेफड़े की सारी हवा निकल जाए | यही क्रिया बार –बार करें | शुरू में कम समय के लिए करें बाद में कुछ दिनों के बाद pranayam का समय बढ़ाएं | अधिक जानकारी के लिए योग ( YOGA ) वाला निबंध देखें |

पानी ( WATER ) हम बिना पानी पिए अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकते हैं | आम तौर पर शरीर के लिए हम पानी का उपयोग दो तरह से करते हैं | पहला  आंतरिक और दूसरा वाह्य उपयोग | भोजन हजम करने और शरीर में पानी की कमी पूरा करने में यह काम आता है | दिन भर में तीन लीटर ( दस – बारह गिलास ) पानी पीना चाहिए | शरीर के विषैले पदार्थ पेशाब के जरिये बाहर निकलते हैं , इसलिए भरपूर पानी पीना चाहिए | पानी का वाह्य उपयोग नहाने – धोने में करते हैं |

प्राकृतिक चिकित्सा ( Naturopathy ) में पानी से इलाज के लिए अनेक विधियां हैं |

पानी की पट्टी – ठन्डे पानी से भिगोये सूती कपड़े को कई तह कर के शरीर के किसी भी हिस्से में इस्तेमाल कर सकते हैं | आक्रांत स्थान से काफी दूर तक इस पट्टी को लगाना है |

ढकी हुई पट्टी – जब पट्टी को निचोड़ कर इस्तमाल करते हैं और उसके ऊपर ऊनी या फलालेन से पट्टी को अच्छी तरह ढंकते हैं तब यह ढकी हुई पट्टी कहलाती है | जब गले के चारों ओर इस पट्टी का प्रयोग करते हैं तो उसे गले की पट्टी , छाती और गर्दन के चारों ओर देने से छाती की पट्टी , सिर्फ छाती के चारों ओर देने पर छाती की सरल पट्टी , पेट के चारों ओर देने पर पेट की पट्टी ,नितम्ब में देने से बस्ति की पट्टी , जाँघों में देने पर जाँघों की पट्टी , पैर में देने से पैर की पट्टी , धड़ के चारों और देने से धड़ की पट्टी और गले से पैरों तक के ढँकी पट्टी को भीगी चादर की पट्टी कहते हैं | 

एक प्रयोग देख लें , बाकी सभी पट्टियाँ इसी तरह से की जाती हैं |

गले की पट्टी – एक सूती कपड़े का टुकड़ा लें | खादी का कपड़ा , रूमाल या धोती का टुकड़ा भी हो सकता है , जिससे पूरे गले को लपेटा जा सके | ध्यान रहे कपड़े के दो या चार तह से गले को लपेटना है | कपड़े  के टुकड़े को पानी भिगोइए और निचोड़ लीजिये | इसे गले के चारों ओर लपेटिये और इसके ऊपर ऊनी मफलर लपेटिये | शुरू में ठंड लगेगी , कुछ समय बाद पट्टी गर्म हो जाएगी | इस पट्टी को आप पन्द्रह –बीस मिनट से घंटे भर के लिए भी रख सकते हैं | यह आप गले के किसी भी रोग में कर सकते हैं | अगर आप को लगता है कि ऐसे में तो ठण्ड लग जायेगी , तो यह आपका भ्रम है |

स्नान ( BATH ) प्राकृतिक चिकित्सा में अनेक प्रकार के स्नानों का प्रयोग होता है | साधारण स्नान , कटि स्नान , मेहन स्नान , तौलिया स्नान ( sponge bath ), वाष्प स्नान ( steam bath ), घर्षण स्नान , सूर्य स्नान इत्यादि |

संतुलित भोजन ( balanced diet )

हवा और पानी की तरह ही भोजन की भी आवश्यकता हमें होती है | भोजन में शरीर की आवश्यकतानुसार पोषक तत्व होने चाहिए | कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन , खनिज लवण , सभी विटामिन , फाइबर और पानी | भोजन गरिष्ट नहीं होना चाहिए | खाना ऐसा खाना चाहिए जो आसानी से हजम हो | बेहतर होगा रोज खाली पेट आंवला चूर्ण 5 -6 ग्राम पानी के साथ खाइए | कब्जियत नहीं रहेगी |शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकलने का मुख्य जरिया है पैखाना | ऐसा मानना है कि समस्त रोगों की जड़ है पेट | इसलिए कब्जियत नहीं रहना चाहिए | विस्तार से जानने के लिए ‘ शरीर का सिस्टम कैसे काम करता है ’ निबंध पढ़ें |

विश्राम ( relexation )

दिन भर काम करने के बाद विश्राम करना चाहिए | मतलब यह कि काम की परेशानियों को किनारे कर दीजिये और तनावमुक्त हो जाइये | यह मनोरंजन के द्वारा भी हो सकता है | शारीरिक थकान दूर करने के लिए बिस्तर पर लेट कर या आराम कुर्सी पर शरीर को शिथिल करें | आँखें बंद कर लें और धीरे- धीरे लम्बी साँसें लीजिये और वैसे ही धीरे धीरे लम्बी साँसें छोडिये | मन में सोचिये मेरा अंग –प्रत्यंग ढीला पड़ता जा रहा है | ऐसा करने पर दस –पंद्रह मिनट में ही आपको इसका फायदा पता चलेगा | शरीर की थकान गायब हो जाएगी और स्फूर्ति का संचार होगा |

गहरी नींद ( deep sleep )

स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन हमें कम से कम आठ घंटे सोना चाहिए | दिन में काम के कारण हमारे शरीर के अन्दर जो टूट –फूट होती है , उसकी मरम्मत हमारे नींद के दौरान होती है | नींद पूरी होने के बाद स्वयं को तरोताजा महसूस करते हैं | नींद की अवस्था में हमारा अवचेतन मन सक्रिय रहता है | इसका फायदा उठाइए | आप अपने अन्दर जो –जो अच्छाईयां चाहते हैं उनके बारे में सोचिये | अपनी सफलता की कल्पना करते रहें और सो जाएँ | यह आत्म – सम्मोहन है | इसका फायदा होता है |

सकारात्मक सोच ( POSITIVE THINKING )

आसान शब्दों में आप अच्छे विचार या सृजनात्मक विचार कह सकते हैं | असल में हम नेगेटिव बातों से ज्यादा जूझते रहते हैं और हमें पता भी नहीं चलता की हमारे स्वास्थ्य की कितनी हानि हो रही है | पहली परेशानी है चिंता की जो चिता तक का रास्ता आसान बनाती है | चाहे कोई भी समस्या हो सबका हल रहता है | कोई व्यवस्थित तरीका ढूँढना चाहिए | रास्ता न दिखे तो किसी अनुभवी व्यक्ति से समाधान पूछना चाहिए | क्रोध , ईर्ष्या , द्वेष और लालच इत्यदि | अत्यधिक क्रोध जब किसी को आता है तो आँखें लाल हो जाती हैं , शरीर कांपने लगता है और मष्तिष्क तनाव ग्रस्त हो जाता है | ऐसा  ही कुछ ईर्ष्या , द्वेष और लालच इत्यादि में भी होता है | मन विकारयुक्त होता है और शरीर अस्वस्थ होता है | दमित भावनाएं अनेक बीमारियों को जन्म देती हैं जिसका निदान ही नहीं हो पाता है | इसलिए नकारात्मक विचारों को छोड़िये और ऐसा सोचिये और कीजिए जो समाज के हित में हो जिससे लोगों का भला हो |

अच्छी आदतें / GOOD HABITS

अच्छी आदतें किसे कहते हैं ? आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ठीक रखने वाली आदत बना कर रखें | इसके लिए व्यायाम सबसे अच्छा होता है | योगासन करें |

 योगासन / आसन / YOGA

पुराने समय में हमारे ऋषि –मुनियों ने व्यायाम का एक तरीका विकसित किया जिसे आसन या योगासन कहते हैं | नियमित आसन करने पर खाना हजम करने वाली प्रक्रिया ( DIGESTIVE SYSTEM ) अच्छी तरह से काम करती है | कब्जियत दूर होती है | स्नायु सबल होते हैं | बुद्धि और स्मरण शक्ति बढ़ती है | नलिका विहीन ग्रंथियों ( ENDOCRINE GLANDS ) की कार्य क्षमता बढ़ती है | चयापचय ( METABOLISM ) बढ़ता है | फलस्वरूप रोग प्रतिरोधक शक्ति  (IMMUNITY ) बढ़ती है और आदमी बूढ़ा नहीं होता है |

उड्डियान – पद्मासन में बैठकर साँस छोड़ कर फेफड़े खाली कीजिए और पेट को अन्दर खींचिए ऐसा कि रीढ़ से सट जाए | खड़े होकर यह करना आसन होता है | दोनों पैर थोड़ा फैला कर खड़े हो जाइए | थोड़ा झुक कर दोनों घुटनों पर हाथ रखें | साँस पूरी तरह छोड़िये और पेट को अन्दर खींच लीजिये | थोड़े समय के बाद साँस लेते हुए सीधे खड़े हो जाइए | शुरू में पाँच –सात बार कीजिए | कुछ दिनों बाद 15 -20 बार कर सकते हैं | इस आसन से पेट सम्बन्धी गड़बड़ियाँ ठीक होती हैं |

उत्थान पदासन – कोई चटाई बिछा कर सीधा लेट जाइए | दोनों हाथ बगल में सटा कर रखें | दोनों पैरों को लगभग तीस डिग्री तक उठा कर कुछ सेकेण्ड रखिये , उसके बाद वापस जमीन पर ले आयें | यही क्रिया पाँच –सात बार करें | कुछ दिनों बाद दस- पंद्रह बार करें | इस आसन को नियमित करने पर पाचन संबधी गड़बड़ियाँ ठीक होती है साथ ही साथ पेट की चर्बी घटती है |

भुजंगासन – चटाई पर पट लेट जाइये | दोनों हाथों को छाती के बगल में चटाई पर पंजे जमकर कमर से ऊपर के शरीर को पूरा उठाइए | दोनों हाथ सीधे रखें और सिर पीछे ले जाएँ | इसी स्थिति में कुछ देर रहने के बाद फिर सामान्य स्थिति में आ जाइये | ऐसा पाँच –दस बार कीजिए | नियमित यह आसन करने पर पेट कि चर्बी समाप्त हो जाती है | मेरुदंड लचीला बनाये रखने का अच्छा आसन है |

धनुरासन – पेट के बल लेट कर कमर से आगे के हिस्से को ऊपर उठाइए साथ ही पैरों को पीछे मोड़िये और हाथों से पकड़ लें | पैरों को हाथों से अच्छी तरह खींचिए ताकि पेट पर शरीर टिका रहे | ऐसी स्थिति में थोड़ी देर रहें उसके बाद सामान्य स्थिति में आ जाएँ | यही क्रिया पाँच से दस बार करें | यह आसन नियमित रूप से करने पर मेरुदंड लचीला और मजबूत होता है | रीढ़ की हड्डी से निकलने वाली स्नायु मजबूत होती है | पेट की चर्बी घटती है | पाचन क्रिया ठीक होती है | छाती संबंधी रोगों में फायदा होता है |

सर्वांगासन – चटाई पर चित लेट जाइए | दोनों पैरों को सटा लें | दोनों हाथों को बगल में रखें | इस आसन में , जमीन में आपका सिर और कंधे रहेंगे | पैरों को ऊपर उठाइए और बाकी शरीर को सीधा करने के लिए दोनों हाथों को कोहनी तक जमीन पर टिका कर रखना है और हथेली की सहायता से कमर को थाम लेना है | रोमन लिपि के  ‘ L ’ की तरह शरीर को करना है | आपकी ठोड़ी आपकी छाती से सट जाए | ऐसी स्थिति में तीस – चालीस सेकेण्ड रहें और धीरे –धीरे शरीर को शरीर को सामान्य स्थिति में ले आयें | बाद में ढाई – तीन मिनट तक कर सकते हैं |

इस आसन में पैरों के तरफ का अशुद्ध खून अधिक मात्रा में दिल  में पहुँचता है | इसके बाद फेफड़े में पहुँच कर शुद्ध हो जाता है | रक्त शुद्धि होने पर शरीर के अनेक अवयव स्वस्थ होने लगते हैं | इस आसन में थाईराइड ग्रंथि का व्यायाम होता है | थाईराइड अच्छे से काम करने पर पिट्यूटरी को पोषण और उत्तेजना मिलती है | अन्य नलिका विहीन ग्रंथियों का कार्य भी सुधरता है | यह आसन बुढ़ापे को रोक देती है |

शीर्षासन – यह आसन सिर के बल खड़े होने का है | शीर्षासन को आसनों का राजा कहते हैं | इस आसन के अभ्यास से स्नायविक शक्ति और स्मरण शक्ति बढ़ती है | फलस्वरूप आदमी बुढ़ापे से दूर रहता है | शुरू में बहुत कम समय के लिए करते हैं , बाद में अवधि बढ़ाते हैं | उच्च रक्तचाप की शिकायत हो तो यह आसन न करें |

शवासन – चटाई पर चित लेट जाइए और पूरे शरीर को शिथिल कर लीजिये | बस हो गया शवासन | शव कहते हैं मुर्दे को | शरीर को निर्जीव शरीर की तरह ढीला छोड़ने पर ही इस आसन का फायदा होगा | दस – पंद्रह मिनट कर सकते हैं | हो सकता है आप को नींद आ जाए , अच्छी बात है |

नशीले पदार्थों का सेवन न करें | सभी से दोस्ताना  व्यवहार करें | जरूरतमंदों की मदद करें | सुबह उठे , रात को जल्दी सो जाएँ | प्रकृति से जुड़ कर रहें तो लम्बी आयु मिलेगी |

 

 

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

avatar
  Subscribe  
Notify of