बेचैन कभी थे तेरे लिए दुश्मन

 

 

बेचैन कभी थे तेरे लिए दुश्मन था जमाना अपना

माजी के ढलते जिस्म पे हर जख्म पुराना अपना

 

हाथों में तेरे मेंहदी रची मयखाना गया दीवाना तेरा

हर जाम तेरे ही नाम पिया, पाया है ठिकाना अपना

 

हर तीर निशाने पर लगती ऐसी भी कोई बात नहीं

हालात का मारा मैं भी था चूका है निशाना अपना

 

एहसान किसी का क्यों ले ,मतलब की दुनिया में कोई

मजबूरी नहीं तो क्या है ये गैरों को बनाना अपना

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