विषमताएं कब से बढ़ती रही हैं

 

विषमताएं कब से बढ़ती रही हैं

मान्यताएँ सड़ती -गलती रही हैं

 

अट्टालिकाएँ शान से खड़ी हैं

कहीं फर्श धरती, छत ही नहीं है

घनघोर बारिश, तूफान भी है

लाचार खड़ा इन्सान ही है

 

कसीदे कढ़े हैं चमकती जरी है

कहीं तन खुले हैं, आँचल नहीं है

खाना नहीं है, दाना नहीं है

चहुँ ओर भूख की अग्नि लगी है

 

मजबूरियों की सूची बढ़ी है

सहनशीलता की सीमा बढ़ी है

अकिंचन खड़े हैं अगुवा नहीं है

समस्याएं अब भी खड़ी की खड़ी है

 

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